वेलिंगटन, 2015। हम साइटें बनाते थे, होस्ट नहीं करते थे।
हम अपने ही शहर के छोटे कारोबारों के लिए वेबसाइटें बनाते थे। उनमें से कोई रात नौ बजे बंद होती, तो बजता हमारा फ़ोन था। हम माफ़ी माँगते, पता करने का वादा करते, और फिर ऐसे होस्ट की लाइन पर लगे रहते जो हमें कुछ बताता ही नहीं था।
तरीका कभी नहीं बदला। ग्राहक को सबसे पहले कोई नहीं बताता था। साइट शिफ़्ट करने में ग्राहक का एक दिन जाता और हमारा एक वीकेंड। और दूसरे साल के बिल का आंकड़ा कभी वह नहीं होता था जो साइन अप के वक़्त पेज पर लिखा था।
दूसरों की ओर से माफ़ी माँगते-माँगते हम थक गए। इसलिए हमने वही होस्ट बनाया जिसे हम अपने ग्राहक सौंपना चाहते। जिन बातों पर हमें तब शर्म आती थी, वे अब पेज पर नहीं, अनुबंध में लिखी हैं, और तब से हिली नहीं हैं।